Friday, July 20, 2007

कैम्पस न्युक्ति; चतुर्थ डगर

मुश्किलें दिलों के इरादे आजमाती हैं
स्वप्न के पर्दे निगाहों से हटाती हैं।
हौसला मत हार गिरके ओ मुसाफिर
ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती है।

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नई जिन्दगी आज फिर से मिली
मिलते पल-पल नज़ारे भी बिल्कुल हँसी
मिल सके न हमारे और उनके कदम
फिर भी होते रहेंगे क्या-क्या सीतम।
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मगर सिख इससे भी मिलती रही है
समय गर सही है तो सबकुछ सही है
वरन शाख कितनी भी मजबूत क्यों न
आंधी चली है तो वह भी गिरी है।
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गिर के उठे जो तो लहरों सरिखे
उठ न सके तो गिर-गिर के सिखें
मगर सिखना है हमारी जरूरत
जीकर भी सिखें और मरकर भी सिखें।
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सिखा यहाँ कुछ तो बस जिन्दगानी
नियमों की सीमा पर बस मनमानी
संयम अगर हो तो नियमों की चलती
मगर जोश आए तो नियमें पिघलती।
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पिघती नहीं साथ नियमें निरंतर
तो मुश्किल में होता था अपना भी जंतर
अगर जीत जाए प्रबंधन जो हम से
हमें फ़क्र होता- जंग थी अपनी उन से।
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जमाने के कातिल बनाए हुए हम
हंसते-हंसते गमों को समाए हुए हम
हम से मिलते गए वो मिलाते गए हम
नज़रों से पीते पिलाते रहे हम।
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मगर आज फिर से है धुमिल सितारे
कहो कौन पूछे हमें आज प्यारे
आज चहके हैं पंछी फुल खिलते हैं सारे
मगर कौन आज अपनी किस्मत सँवारे?
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रातों मे तुफ़ां तो उठते रही है
दिन के उजाले मे थम भी गई है
थमना भी है अब हमारी जरूरत
जमीं आसमां में दिखेगी जो सुरत।
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सुरत हमारी लिखे वो कहानी
किताबों के पन्नों मे जलती जवानी
प्रमानों के पत्रों से खुशबु की आशा
ज्ञान की गंगा में बहती दिलासा

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