Sunday, June 17, 2007

कैम्पस न्युक्ति; प्रथम डगर

"खुद ही को कर बुलन्द इतना कि हर तक्दीर से पहले
खूदा खुद बंदे से पूछे बता तेरी रजा क्या है... "
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वर्षों गुजार डाला फ़क्र है हमें
और आज भी हम इत्मिनान से हैं।
चंद ही दिनों मे धरती सरकने को है
पर हम तो अभी से ही चाँद पर हैं।
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चार वर्षों की कश्मकस और लड़ाई
तब जाकर मिलती है डिग्री-सी मिठाई
किन्तु इससे पहले होता है दौरा उनका
किस्मत अपनी रूप संवारे, आइना किसका?
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जी हाँ, यह कैम्पस न्युक्ति की कहानी है
जिसमें कोई राजा नहीं, न कोई रानी है।
हम छात्रों का भविष्य पल-पल डगमगाए
तो शिक्षक कहते-"जौब नहीं बेटे तो आगे भी पढ़ाई है"।
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अब अपनी-अपनी सोच, अपना-अपना फैसला
कितने प्रमानपत्र और कितना हौसला
अंग्रेजी का विशेष ज्ञान, वार्तालाप के लिए
क्या है मूल मंत्र साक्षात्कार के लिए?
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मंत्र तो हजार हैं जब आप ही बिमार हैं,
मगर हम बताते हैं नुस्ख गर आप लाचार हैं।
जीने के दो जरिए और मरने के चार हैं
और सफल सीनियर्स ही आज सलाहकार हैं।
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सुबह से शाम तक बस चलते रहो तुम...
रोशनी का साथ हो तो किंचित गीरो न तुम।
मगर जब मंजिल के बाद होती शुरू सफर
पथ तब भी होती है बस आती नहीं नजर।
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सुबह सौन्दर्य सरिखे है, फुल किरणों से तार-तार
मुढ-मुर्क्षित भी सजग हों तो कर लेते हैं नैया पार
पर अपनी सम्मा तो बस जुगनु से जलती है
क्या पता अंत किधर और कहाँ धार बहती है।
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फिर भी एक आस होती है, कंठों में प्यास होती है
रास्ता ढूंढ ही लेगें हम जो सुक्ष्म प्रकाश होती है।
चार वर्ष यूं ही गंवाया नहीं, कुछ पाया भी है..
ठोकरें खाते रहे किन्तु पग को जमाया भी है।
*
जिन्दगी यू हीं फ़सानों से नहीं चलती जनाब
हमने कहावत को भी अमल कर दिखाया है।
आशिकी के जंग में जख्मी तो हुए थे लेकिन,
हमने मौत के ख़ौफ को भी गले से लगाया है।
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1 comment:

Om said...

यार कसम से कलम तोड़ दी तुमने.

अगर मुझे एक शब्द में कहना हो तो वह शब्द "लाजवाब" होगा...