"बस इक कदम उठी थी गलत राहे शौक़ में...
मंजिल तमाम उम्र मुझे ढुंढती रही..."
******************************************************
****************************************
प्रश्नों से रीझा था धूमिल सा चेहरा
फिर भी नयन में था बस एक मोहरा
मिलने की थी बस गुजारिस उसी से
मिला न उसे तब मिलुं आज कैसे?
फिर भी नयन में था बस एक मोहरा
मिलने की थी बस गुजारिस उसी से
मिला न उसे तब मिलुं आज कैसे?
*
पास जाऊं मैं कैसे, हिम्मत न थी अब
उसकी रूश्वाई थी एक कड़वी हक़ीकत
मगर यार मेरी भी ज़ुल्मी जरूरत
जरुरत भी ऐसी नहीं जिसका पूरक।
*
उस तक पहुँचने की ठानी जो मैने
मेरे राह बीच चील कौवे और मैने
सब साथ थे और था मैं अकेला
हुई जंग और फिर ओझल सवेरा।
****************************************
पास जाऊं मैं कैसे, हिम्मत न थी अब
उसकी रूश्वाई थी एक कड़वी हक़ीकत
मगर यार मेरी भी ज़ुल्मी जरूरत
जरुरत भी ऐसी नहीं जिसका पूरक।
*
उस तक पहुँचने की ठानी जो मैने
मेरे राह बीच चील कौवे और मैने
सब साथ थे और था मैं अकेला
हुई जंग और फिर ओझल सवेरा।
****************************************
****************************************
मगर आज भी वो सीतम भूला न पाया
पल-पल मरा पर आज भी जान न पाया
कत्ल तो मेरा हुआ ही किसने किया ये खून?
जमाने का बर्बर खंजर या उनके लम्बे नाखून?
*
कोई हो खूनी मरने का तजुर्बा तो मुझे ही मिला
दस दिनों की खामोशी के बाद पुनरजन्म तो हुआ
नयी जिन्दगी नया फ़रमान और नया रुत्वा
सोच सीमटी और उठ खड़ा हुआ पुराना पुतला।
*
अनेको वार झेले थे सो अब भी लड़खड़ाता था
उनसे नज़रें बचाकर ही कालेज जाता था।
मिले जो नज़रें कभी तो सनसनी सी हो जाती
कारण क्या था बात अब भी समझ में नहीं आती।
मगर आज भी वो सीतम भूला न पाया
पल-पल मरा पर आज भी जान न पाया
कत्ल तो मेरा हुआ ही किसने किया ये खून?
जमाने का बर्बर खंजर या उनके लम्बे नाखून?
*
कोई हो खूनी मरने का तजुर्बा तो मुझे ही मिला
दस दिनों की खामोशी के बाद पुनरजन्म तो हुआ
नयी जिन्दगी नया फ़रमान और नया रुत्वा
सोच सीमटी और उठ खड़ा हुआ पुराना पुतला।
*
अनेको वार झेले थे सो अब भी लड़खड़ाता था
उनसे नज़रें बचाकर ही कालेज जाता था।
मिले जो नज़रें कभी तो सनसनी सी हो जाती
कारण क्या था बात अब भी समझ में नहीं आती।
************************************************
************************************************
और दूसरे तरफ जमाने ने भी ली ऐसी अंगड़ाई
दोस्तों से हुई दोस्ती और दुस्मन बन गए भाई
मरने का अब कोई गम नहीं है, मित्र !
सीतम तब सीतम थे, वे तो कल के गम थे।
*
आज तो बस अतीत के वे स्वर्णम क्षण हैं।
हमारे नादानियों से अंकित बीते पल हैं।
लोग कहते हैं मैं अर्थी से जींदा हओ उठा हूं
जिंदगी छोटी है मित्र- मैं अर्थी पर कई बार जी चुका हूं।
*
वो मिले ना मिले, आज कोई गम नहीं
जिन्दगी मौत का हमको कोई वहम नहीं
अकेले ही शिखर तक आज जाएंगे हम
पुन: बहारों के संग आज गाएंगे हम।
दोस्तों से हुई दोस्ती और दुस्मन बन गए भाई
मरने का अब कोई गम नहीं है, मित्र !
सीतम तब सीतम थे, वे तो कल के गम थे।
*
आज तो बस अतीत के वे स्वर्णम क्षण हैं।
हमारे नादानियों से अंकित बीते पल हैं।
लोग कहते हैं मैं अर्थी से जींदा हओ उठा हूं
जिंदगी छोटी है मित्र- मैं अर्थी पर कई बार जी चुका हूं।
*
वो मिले ना मिले, आज कोई गम नहीं
जिन्दगी मौत का हमको कोई वहम नहीं
अकेले ही शिखर तक आज जाएंगे हम
पुन: बहारों के संग आज गाएंगे हम।
********************************************
*********************************************