Wednesday, June 20, 2007

कैम्पस न्युक्ति; त्रितीय डगर

"बस इक कदम उठी थी गलत राहे शौक़ में...
मंजिल तमाम उम्र मुझे ढुंढती रही..."
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प्रश्नों से रीझा था धूमिल सा चेहरा
फिर भी नयन में था बस एक मोहरा
मिलने की थी बस गुजारिस उसी से
मिला न उसे तब मिलुं आज कैसे?
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पास जाऊं मैं कैसे, हिम्मत न थी अब
उसकी रूश्वाई थी एक कड़वी हक़ीकत
मगर यार मेरी भी ज़ुल्मी जरूरत
जरुरत भी ऐसी नहीं जिसका पूरक।
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उस तक पहुँचने की ठानी जो मैने
मेरे राह बीच चील कौवे और मैने
सब साथ थे और था मैं अकेला
हुई जंग और फिर ओझल सवेरा।
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मगर आज भी वो सीतम भूला न पाया
पल-पल मरा पर आज भी जान न पाया
कत्ल तो मेरा हुआ ही किसने किया ये खून?
जमाने का बर्बर खंजर या उनके लम्बे नाखून?
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कोई हो खूनी मरने का तजुर्बा तो मुझे ही मिला
दस दिनों की खामोशी के बाद पुनरजन्म तो हुआ
नयी जिन्दगी नया फ़रमान और नया रुत्वा
सोच सीमटी और उठ खड़ा हुआ पुराना पुतला।
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अनेको वार झेले थे सो अब भी लड़खड़ाता था
उनसे नज़रें बचाकर ही कालेज जाता था।
मिले जो नज़रें कभी तो सनसनी सी हो जाती
कारण क्या था बात अब भी समझ में नहीं आती।
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और दूसरे तरफ जमाने ने भी ली ऐसी अंगड़ाई
दोस्तों से हुई दोस्ती और दुस्मन बन गए भाई
मरने का अब कोई गम नहीं है, मित्र !
सीतम तब सीतम थे, वे तो कल के गम थे।
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आज तो बस अतीत के वे स्वर्णम क्षण हैं।
हमारे नादानियों से अंकित बीते पल हैं।
लोग कहते हैं मैं अर्थी से जींदा हओ उठा हूं
जिंदगी छोटी है मित्र- मैं अर्थी पर कई बार जी चुका हूं।
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वो मिले ना मिले, आज कोई गम नहीं
जिन्दगी मौत का हमको कोई वहम नहीं
अकेले ही शिखर तक आज जाएंगे हम
पुन: बहारों के संग आज गाएंगे हम।
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Monday, June 18, 2007

कैम्पस न्युक्ति; द्वितीय डगर

"हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन
फिर भी कम निकले.."

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और आज अनुभूतियों का है हम पर बसेरा
न रूकने की चाहत, है हर पल सवेरा।
हजारों है कोशिष मगर एक सपना
सपनों में चमके है- स्वर्णिम सी लंका।
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मगर उसके मालिक की कैसी हुकुमत
वो सपनों मे सींचे है क्या-क्या जरूरत?
जमीं पर मेरे पांव कम्पन ही लाते
मगर स्वप्न में चांद तारे ही भाते।
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इन्हीं स्वप्न से यार मंजिल जमीं है
स्वप्नों ने हर पल अंगुठी जड़ी है।
लोहे के पत्थर जो जड़ दे अंगुठी...
मैली परत हो तो किस्मत भी रूठी!
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दो पल जमी दोस्ती जम गई तब
सूने सड़क पर शोर सनहाई है अब
अंगुठी रची स्वप्न के धार से जो
बीते पलों से चमकने लगी है।
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वो पल जिन्दगी के स्वर्णिम पहर थे
अहो भाग्य मेरे! ये कैसी लहर है।
समय की अदाओं पे ढलने लगे जो
अपनी शरारत के फिके शिखर हैं।
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शरारत शराफ़त नज़ाकत सभी थे
दिल जो लगाए तो सब कुछ वही थे।
जीने का जरिया वही हो चले तो,
उनकी गुजारिस में गमगीन भी थे।
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गमगीन ऐसा कि एक स्वप्न जैसा
परियों की महफिल में हस्ती जमाए
उनकी जरूरत को हम आजमाएं
तरसते नयन पर जी जान लुटाएं।
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मगर लुट गया खुद शबाबे नयन में
हर पल गुजारा अलग ही चमन में।
थी वो ख्वाब में या मैं उसके मन में
समय पूछता मैं समय के कफ़न में।
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वर्षों गुजारा हो दस दिन के क्षण में
यादों मे उनके, बदलते चमन में।
मगर मेरी बदली दिशाओं से बदली
मित्रों की दृष्टि हुई मुझ पे वृष्टी।
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Sunday, June 17, 2007

कैम्पस न्युक्ति; प्रथम डगर

"खुद ही को कर बुलन्द इतना कि हर तक्दीर से पहले
खूदा खुद बंदे से पूछे बता तेरी रजा क्या है... "
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वर्षों गुजार डाला फ़क्र है हमें
और आज भी हम इत्मिनान से हैं।
चंद ही दिनों मे धरती सरकने को है
पर हम तो अभी से ही चाँद पर हैं।
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चार वर्षों की कश्मकस और लड़ाई
तब जाकर मिलती है डिग्री-सी मिठाई
किन्तु इससे पहले होता है दौरा उनका
किस्मत अपनी रूप संवारे, आइना किसका?
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जी हाँ, यह कैम्पस न्युक्ति की कहानी है
जिसमें कोई राजा नहीं, न कोई रानी है।
हम छात्रों का भविष्य पल-पल डगमगाए
तो शिक्षक कहते-"जौब नहीं बेटे तो आगे भी पढ़ाई है"।
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अब अपनी-अपनी सोच, अपना-अपना फैसला
कितने प्रमानपत्र और कितना हौसला
अंग्रेजी का विशेष ज्ञान, वार्तालाप के लिए
क्या है मूल मंत्र साक्षात्कार के लिए?
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मंत्र तो हजार हैं जब आप ही बिमार हैं,
मगर हम बताते हैं नुस्ख गर आप लाचार हैं।
जीने के दो जरिए और मरने के चार हैं
और सफल सीनियर्स ही आज सलाहकार हैं।
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सुबह से शाम तक बस चलते रहो तुम...
रोशनी का साथ हो तो किंचित गीरो न तुम।
मगर जब मंजिल के बाद होती शुरू सफर
पथ तब भी होती है बस आती नहीं नजर।
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सुबह सौन्दर्य सरिखे है, फुल किरणों से तार-तार
मुढ-मुर्क्षित भी सजग हों तो कर लेते हैं नैया पार
पर अपनी सम्मा तो बस जुगनु से जलती है
क्या पता अंत किधर और कहाँ धार बहती है।
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फिर भी एक आस होती है, कंठों में प्यास होती है
रास्ता ढूंढ ही लेगें हम जो सुक्ष्म प्रकाश होती है।
चार वर्ष यूं ही गंवाया नहीं, कुछ पाया भी है..
ठोकरें खाते रहे किन्तु पग को जमाया भी है।
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जिन्दगी यू हीं फ़सानों से नहीं चलती जनाब
हमने कहावत को भी अमल कर दिखाया है।
आशिकी के जंग में जख्मी तो हुए थे लेकिन,
हमने मौत के ख़ौफ को भी गले से लगाया है।
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